पातकोम दिशोम माझी परगना महाल ने स्वशासन व्यवस्था समेत संविधानिक अधिकारों का चर्चा किया

पांचवीं अनुसूची, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट समेत अन्य बिंदुओं पर आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख व बुद्धिजीवियों ने गहन चिंतन-मंथन किया

पातकोम दिशोम माझी परगना महाल ने स्वशासन व्यवस्था समेत संविधानिक अधिकारों का चर्चा किया

मुख्य बातें

  • आदिवासियों के रूढ़ी प्रथा पांचवीं अनुसूची को विस्तृत रूप से चर्चा!
  • गौ हत्या निषेध अधिनियम-2005 को झारखंड सरकार से निरस्त करने की मांग करते हैं।
  • 31 अगस्त 2022 को पत्र लिखकर ज्ञापन तैयार कर झारखण्ड सरकार को सूचना प्रेषित करने का निर्णय

चांडिल: आदिवासियों को प्रदत्त संविधानिक अधिकार, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, खान-पान, पर्व-त्योहार, पांचवीं अनुसूची, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट समेत अन्य बिंदुओं पर आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख व बुद्धिजीवियों ने गहन चिंतन-मंथन किया. सरायकेला-खरसावां जिले अंतर्गत के चांडिल डैम स्थित शीशमहल में पातकोम दिशेाम माझी परगना महाल की ओर विशेष बैठक का आयोजन किया गया था. विशेष बैठक में विभिन्न गांव से आये माझी बाबा, नायके बाबा, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, परगना बाबा आदि ने उक्त बिंदुओं पर अपना विचार दिया.

खान-पान प्रतिबंध लगाने की कोशिश उचित नहीं

वक्ताओं ने कहा कि प्रत्येक समाज की अपनी विशेषता है. उनका खान-पान व रहन-सहन बिलकुल अलग-अलग है. एक ही परिवार में कुछ लोग मांसाहारी है तो कुछ लोग शाकाहारी हैं. उसी तरह समाज व समुदाय के साथ भी है. उनका पूजा पद्धति बिलकुल अलग है. वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक हैं. किसी तरह के विवाद में रहना उनका स्वभाव नहीं है. इसलिए अन्य समाज व समुदाय को आदिवासियों के खान-पान व रहन-सहन पर कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. यह उनका संविधानिक अधिकार है. कोई संविधानिक अधिकार पर अवरूद्ध पैदा करने की कोशिश करे, यह बिलकुल उचित नहीं है.

आदिवासियों का अस्तित्व बचेगा तो पर्यावरण बचेगा

स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख परगना, माझी बाबा व नायके बाबा ने कहा कि आदिवासियों को अपने आदिवासी होने पर गर्व है. आदिवासी समुदाय आज भी प्रकृति के सानिध्य में रहकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं. प्रकृति को ही अपना सबकुद मानते हैं. इतना ही उनकी पूजा अर्चना करते हैं. वे प्रकृति के आचरण के अनुरूप ही अपना पर्व-त्योहार मनाते हैं. उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व ग्लोबल वॉमिंग को लेकर चिंतित है. कई देशों में प्रकृति का संतुलन बिगड चुका है. जिसका खामियाजा कई देश भुगत रहे हैं. इसलिए समय रहते प्रकृति की पुकार को समझने की जरूरत है. अन्यथा आने वाले दिनों में स्थिति भयावह हो सकती है. यह कहने वाली बात नहीं है, बल्कि पूरा विश्व जानता है कि जहां कहीं भी आदिवासी निवास करते हैं, वहां पेड-पौधों की संख्या ज्यादा है. आदिवासी जहां निवास करते हैं, वहां चारों ओर हरियाली है. इस धरती पर तबतक जीवन है, जबतक धरती पर हरियाली है. इसलिए इस हरियाली को बनाये रखने के लिए समेकित प्रयास जरूरी है.

स्वशासन व्यवस्था को खत्म की हो रही साजिश

समाज के बुद्धिजीवियों ने कहा कि आदिवासी समुदाय आदि काल से अपने स्वशासन व्यवस्था से संचालित होते हुए आये हैं. अभी भी गांव में उसी व्यवस्था के तहत ही संचालित हो रहे हैं. साथ ही देश के पैमाने पर बनी संविधान का अक्षरश: सम्मान करते हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्था पर प्रहार हो रहा है. उसे खत्म की करने की साजिश हो रही, जो उचित नहीं है. आदिवासी समुदाय हर समाज व समुदाय का सम्मान करता है.

चिंतन-मंथन में ये थे मौजूद

पातकोम दिशोम मांझी परगना महाल के चिंतन-मंथन में परगना बाबा रामेश्वर बेसरा, सचिव श्यामल मार्डी, दुर्गाचरण मुर्मु, नवीन मुर्मू, गुरुचरण किस्कू, सुकराम हेम्ब्रम, तनकोचा ग्राम प्रधान ठाकुरदास मांझी, मांझी बाबा मोहित मुर्मू, संदीप उरांव, अजय तिर्की, बुद्धेश्वर मार्डी, सुधीर किस्कू, सुदामा हेम्ब्रम, सुकराम टुडू, शिलू टुडू, हराधन मार्डी, बलराम हांसदा, राजा मुर्मू, महेंद्र टुडू, बुद्धेश्वर किस्कू, नेपाल बेसरा, दीपक रंजीत, मधु सोरेन, पंचानन सोरेन, राजेश हांसदा, बाबलु मुर्मू समेत काफी संख्या में स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख, बुद्धिजीवी व ग्रामवासी मौजूद थे.